॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.38.26
तद्दर्शनाह्लादविवृद्धसम्भ्रमः
प्रेम्णोर्ध्वरोमाश्रुकलाकुलेक्षणः ।
रथादवस्कन्द्य स तेष्वचेष्टत
प्रभोरमून्यङ्घ्रिरजांस्यहो इति॥ २६
taddarśanāhlādavivṛddhasambhramaḥ
premṇordhvaromāśrukalākulekṣaṇaḥ |
rathādavaskandya sa teṣvaceṣṭata
prabhoramūnyaṅghrirajāṃsyaho iti|| 26
अर्थ
उन चरणचिह्नोंके दर्शन करते ही अक्रूरजीके हृदयमें इतना आह्लाद हुआ कि वे अपनेको सँभाल न सके, विह्वल हो गये। प्रेमके आवेगसे उनका रोम-रोम खिल उठा, नेत्रोंमें आँसू भर आये और टप-टप टपकने लगे। वे रथसे कूद-कर उस धूलिमें लोटने लगे और कहने लगे—‘अहो! यह हमारे प्रभुके चरणोंकी रज है’॥ २६॥