श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

देहंभृतामियानर्थो हित्वा दम्भं भियं शुचम्।

संदेशाद् यो हरेर्लिंगदर्शनश्रवणादिभिः॥ २७

dehaṃbhṛtāmiyānartho hitvā dambhaṃ bhiyaṃ śucam|

saṃdeśād yo harerliṃgadarśanaśravaṇādibhiḥ|| 27

अर्थ

परीक्षित्! कंसके सन्देशसे लेकर यहाँतक अक्रूरजीके चित्तकी जैसी अवस्था रही है, यही जीवोंके देह धारण करनेका परम लाभ है। इसलिये जीवमात्रका यही परम कर्तव्य है कि दम्भ, भय और शोक त्यागकर भगवान्‌की मूर्ति (प्रतिमा, भक्त आदि) चिह्न, लीला, स्थान तथा गुणोंके दर्शन-श्रवण आदिके द्वारा ऐसा ही भाव सम्पादन करें॥ २७॥

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