kiṃ vāthāpyarhate dattaṃ yad drakṣyāmyadya keśavam|| 3
अर्थ
‘मैंने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है, ऐसी कौन-सी श्रेष्ठ तपस्या की है अथवा किसी सत्पात्रको ऐसा कौन-सा महत्त्वपूर्ण दान दिया है जिसके फलस्वरूप आज मैं भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन करूँगा॥ ३॥
किं मयाऽऽचरितं भद्रं किं तप्तं परमं तपः।
किं वाथाप्यर्हते दत्तं यद् द्रक्ष्याम्यद्य केशवम्॥ ३
‘मैंने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है, ऐसी कौन-सी श्रेष्ठ तपस्या की है अथवा किसी सत्पात्रको ऐसा कौन-सा महत्त्वपूर्ण दान दिया है जिसके फलस्वरूप आज मैं भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन करूँगा॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 366) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/38/3/