॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.38.30
ध्वजवज्रांकुशाम्भोजैश्चिह्नितैरङ्घ्रिभिर्व्रजम्।
शोभयन्तौ महात्मानावनुक्रोशस्मितेक्षणौ॥ ३०
dhvajavajrāṃkuśāmbhojaiścihnitairaṅghribhirvrajam|
śobhayantau mahātmānāvanukrośasmitekṣaṇau|| 30
अर्थ
उनके चरणोंमें ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमलके चिह्न थे। जब वे चलते थे, उनसे चिह्नित होकर पृथ्वी शोभायमान हो जाती थी। उनकी मन्द-मन्द मुसकान और चितवन ऐसी थी मानो दया बरस रही हो। वे उदारताकी तो मानो मूर्ति ही थे॥ ३०॥