उनकी एक-एक लीला उदारता और सुन्दर कलासे भरी थी। गलेमें वनमाला और मणियोंके हार जगमगा रहे थे। उन्होंने अभी-अभी स्नान करके निर्मल वस्त्र पहने थे और शरीरमें पवित्र अंगराग तथा चन्दनका लेप किया था॥ ३१॥
उदाररुचिरक्रीडौ स्रग्विणौ वनमालिनौ।
पुण्यगन्धानुलिप्तांगौ स्नातौ विरजवाससौ॥ ३१
उनकी एक-एक लीला उदारता और सुन्दर कलासे भरी थी। गलेमें वनमाला और मणियोंके हार जगमगा रहे थे। उन्होंने अभी-अभी स्नान करके निर्मल वस्त्र पहने थे और शरीरमें पवित्र अंगराग तथा चन्दनका लेप किया था॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 371) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/38/31/