॥ श्रीहरिः ॥
रथात्तूर्णमवप्लुत्य सोऽक्रूरः स्नेहविह्वलः।
पपात चरणोपान्ते दण्डवद् रामकृष्णयोः॥ ३४
rathāttūrṇamavaplutya so'krūraḥ snehavihvalaḥ|
papāta caraṇopānte daṇḍavad rāmakṛṣṇayoḥ|| 34
अर्थ
उन्हें देखते ही अक्रूरजी प्रेमावेगसे अधीर होकर रथसे कूद पड़े और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामके चरणोंके पास साष्टांग लोट गये॥ ३४॥
रथात्तूर्णमवप्लुत्य सोऽक्रूरः स्नेहविह्वलः।
पपात चरणोपान्ते दण्डवद् रामकृष्णयोः॥ ३४
उन्हें देखते ही अक्रूरजी प्रेमावेगसे अधीर होकर रथसे कूद पड़े और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामके चरणोंके पास साष्टांग लोट गये॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 372) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/38/34/