श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं

व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः।

विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं

गोविन्द दामोदर माधवेति॥ ३१

evaṃ bruvāṇā virahāturā bhṛśaṃ

vrajastriyaḥ kṛṣṇaviṣaktamānasāḥ|

visṛjya lajjāṃ ruruduḥ sma susvaraṃ

govinda dāmodara mādhaveti|| 31

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! गोपियाँ वाणीसे तो इस प्रकार कह रही थीं; परन्तु उनका एक-एक मनोभाव भगवान् श्रीकृष्णका स्पर्श, उनका आलिंगन कर रहा था। वे विरहकी सम्भावनासे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं और लाज छोड़कर ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’—इस प्रकार ऊँची आवाजसे पुकार-पुकारकर सुललित स्वरसे रोने लगीं॥ ३१॥✎ 889

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #889 शब्दोंके बीचका स्थान: आऊँगा’यह → आऊँगा’ यह

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