गोपियाँ इस प्रकार रो रही थीं! रोते-रोते सारी रात बीत गयी, सूर्योदय हुआ। अक्रूरजी सन्ध्या-वन्दन आदि नित्य कर्मोंसे निवृत्त होकर रथपर सवार हुए और उसे हाँक ले चले॥ ३२॥✎ 889
स्त्रीणामेवं रुदन्तीनामुदिते सवितर्यथ।
अक्रूरश्चोदयामास कृतमैत्रादिको रथम्॥ ३२
गोपियाँ इस प्रकार रो रही थीं! रोते-रोते सारी रात बीत गयी, सूर्योदय हुआ। अक्रूरजी सन्ध्या-वन्दन आदि नित्य कर्मोंसे निवृत्त होकर रथपर सवार हुए और उसे हाँक ले चले॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 378) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)