श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

दध्यक्षतैः सोदपात्रैः स्रग्गन्धैरभ्युपायनैः।

तावानर्चुः प्रमुदितास्तत्र तत्र द्विजातयः॥ ३०

dadhyakṣataiḥ sodapātraiḥ sraggandhairabhyupāyanaiḥ|

tāvānarcuḥ pramuditāstatra tatra dvijātayaḥ|| 30

अर्थ

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंने स्थान-स्थानपर दही, अक्षत, जलसे भरे पात्र, फूलोंके हार, चन्दन और भेंटकी सामग्रियोंसे आनन्दम‌ग्‍न होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीकी पूजा की॥ ३०॥✎ 1930

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1930 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मत-वाले → मतवाले

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