श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

अक्रूर उवाच

अद्भुतानीह यावन्ति भूमौ वियति वा जले।

त्वयि विश्‍वात्मके तानि किं मेऽदृष्टं विपश्यतः॥ ४

adbhutānīha yāvanti bhūmau viyati vā jale|

tvayi viśvātmake tāni kiṃ me'dṛṣṭaṃ vipaśyataḥ|| 4

अर्थ

अक्रूरजीने कहा—‘प्रभो! पृथ्वी, आकाश या जलमें और सारे जगत‍्में जितने भी अद्भुत पदार्थ हैं, वे सब आपमें ही हैं। क्योंकि आप विश्‍वरूप हैं। जब मैं आपको ही देख रहा हूँ तब ऐसी कौन-सी अद्भुत वस्तु रह जाती है, जो मैंने न देखी हो॥ ४॥✎ 1672

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1672 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गान्दिनी-नन्दन → गान्दिनीनन्दन

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