श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

तावद् व्रजौकसस्तत्र नन्दगोपादयोऽग्रतः।

पुरोपवनमासाद्य प्रतीक्षन्तोऽवतस्थिरे॥ ८

tāvad vrajaukasastatra nandagopādayo'grataḥ|

puropavanamāsādya pratīkṣanto'vatasthire|| 8

अर्थ

नन्दबाबा आदि व्रज-वासी तो पहलेसे ही वहाँ पहुँच गये थे, और मथुरापुरीके बाहरी उपवनमें रुककर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे॥ ८॥✎ 1672

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1672 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गान्दिनी-नन्दन → गान्दिनीनन्दन

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