श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

मार्गे ग्रामजना राजंस्तत्र तत्रोपसंगताः।

वसुदेवसुतौ वीक्ष्य प्रीता दृष्टिं न चाददुः॥ ७

mārge grāmajanā rājaṃstatra tatropasaṃgatāḥ|

vasudevasutau vīkṣya prītā dṛṣṭiṃ na cādaduḥ|| 7

अर्थ

परीक्षित्! मार्गमें स्थान-स्थानपर गाँवोंके लोग मिलनेके लिये आते और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीको देखकर आनन्द-म‌ग्‍न हो जाते। वे एकटक उनकी ओर देखने लगते, अपनी दृष्टि हटा न पाते॥ ७॥✎ 1672

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1672 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गान्दिनी-नन्दन → गान्दिनीनन्दन

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