॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.42.14
तद्दर्शनस्मरक्षोभादात्मानं नाविदन् स्त्रियः।
विस्रस्तवासःकबरवलयालेख्यमूर्तयः ॥ १४
taddarśanasmarakṣobhādātmānaṃ nāvidan striyaḥ|
visrastavāsaḥkabaravalayālekhyamūrtayaḥ || 14
अर्थ
उनके दर्शनमात्रसे स्त्रियोंके हृदयमें प्रेमका आवेग, मिलनकी आकांक्षा जग उठती थी। यहाँतक कि उन्हें अपने शरीरकी भी सुध न रहती। उनके वस्त्र, जूड़े और कंगन ढीले पड़ जाते थे तथा वे चित्रलिखित मूर्तियोंके समान ज्यों-की-त्यों खड़ी रह जाती थीं॥ १४॥