श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

बलं च कंसप्रहितं हत्वा शालामुखात्ततः।

निष्क्रम्य चेरतुर्हृष्टौ निरीक्ष्य पुरसम्पदः॥ २१

balaṃ ca kaṃsaprahitaṃ hatvā śālāmukhāttataḥ|

niṣkramya ceraturhṛṣṭau nirīkṣya purasampadaḥ|| 21

अर्थ

उन्हीं धनुषखण्डोंसे उन्होंने उन असुरोंकी सहायताके लिये कंसकी भेजी हुई सेनाका भी संहार कर डाला। इसके बाद वे यज्ञशालाके प्रधान द्वारसे होकर बाहर निकल आये और बड़े आनन्दसे मथुरापुरीकी शोभा देखते हुए विचरने लगे॥ २१॥

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