श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

अदर्शनं स्वशिरसः प्रतिरूपे च सत्यपि।

असत्यपि द्वितीये च द्वैरूप्यं ज्योतिषां तथा॥ २८

adarśanaṃ svaśirasaḥ pratirūpe ca satyapi|

asatyapi dvitīye ca dvairūpyaṃ jyotiṣāṃ tathā|| 28

अर्थ

जाग्रत्-अवस्थामें उसने देखा कि जल या दर्पणमें शरीरकी परछाईं तो पड़ती है, परन्तु सिर नहीं दिखायी देता; अँगुली आदिकी आड़ न होनेपर भी चन्द्रमा, तारे और दीपक आदिकी ज्योतियाँ उसे दो-दो दिखायी पड़ती हैं॥ २८॥

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