श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

छिद्रप्रतीतिश्छायायां प्राणघोषानुपश्रुतिः।

स्वर्णप्रतीतिर्वृक्षेषु स्वपदानामदर्शनम्॥ २९

chidrapratītiśchāyāyāṃ prāṇaghoṣānupaśrutiḥ|

svarṇapratītirvṛkṣeṣu svapadānāmadarśanam|| 29

अर्थ

छायामें छेद दिखायी पड़ता है और कानोंमें अँगुली डालकर सुननेपर भी प्राणोंका घूँ-घूँ शब्द नहीं सुनायी पड़ता। वृक्ष सुनहले प्रतीत होते हैं और बालू या कीचड़में अपने पैरोंके चिह्न नहीं दीख पड़ते॥ २९॥

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