श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

ततस्तावङ्गरागेण स्ववर्णेतरशोभिना।

सम्प्राप्तपरभागेन शुशुभातेऽनुरञ्जितौ॥ ५✎ 1169

tatastāvaṅgarāgeṇa svavarṇetaraśobhinā|

samprāptaparabhāgena śuśubhāte'nurañjitau|| 5

अर्थ

तब भगवान् श्रीकृष्णने अपने साँवले शरीरपर पीले रंगका और बलरामजीने अपने गोरे शरीरपर लाल रंगका अंगराग लगाया तथा नाभिसे ऊपरके भागमें अनुरंजित होकर वे अत्यन्त सुशोभित हुए॥ ५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1169 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): शुशुभातेऽनुरंञ्ज‌ितौ॥ → शुशुभातेऽनुरञ्जितौ॥

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