श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.43.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 43 · अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

पतितस्य पदाऽऽक्रम्य मृगेन्द्र इव लीलया।

दन्तमुत्पाट्य तेनेभं हस्तिपांश्‍चाहनद्धरिः॥ १४

patitasya padā''kramya mṛgendra iva līlayā|

dantamutpāṭya tenebhaṃ hastipāṃścāhanaddhariḥ|| 14

अर्थ

उसके गिर जानेपर भगवान्‌ने सिंहके समान खेल-ही-खेलमें उसे पैरोंसे दबाकर उसके दाँत उखाड़ लिये और उन्हींसे हाथी और महावतोंका काम तमाम कर दिया॥ १४॥

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