‘नन्दनन्दन श्रीकृष्ण और बलरामजी! तुम दोनों वीरोंके आदरणीय हो। हमारे महाराजने यह सुनकर कि तुमलोग कुश्ती लड़नेमें बड़े निपुण हो, तुम्हारा कौशल देखनेके लिये तुम्हें यहाँ बुलवाया है॥ ३२॥
हे नन्दसूनो हे राम भवन्तौ वीरसंमतौ।
नियुद्धकुशलौ श्रुत्वा राज्ञाऽऽहूतौ दिदृक्षुणा॥ ३२
‘नन्दनन्दन श्रीकृष्ण और बलरामजी! तुम दोनों वीरोंके आदरणीय हो। हमारे महाराजने यह सुनकर कि तुमलोग कुश्ती लड़नेमें बड़े निपुण हो, तुम्हारा कौशल देखनेके लिये तुम्हें यहाँ बुलवाया है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.43.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 400) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/43/32/