श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

राजयोषित आश्‍वास्य भगवाँल्लोकभावनः।

यामाहुर्लौकिकीं संस्थां हतानां समकारयत्॥ ४९

rājayoṣita āśvāsya bhagavām̐llokabhāvanaḥ|

yāmāhurlaukikīṃ saṃsthāṃ hatānāṃ samakārayat|| 49

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे संसारके जीवनदाता हैं। उन्होंने रानियोंको ढाढ़स बँधाया, सान्त्वना दी; फिर लोकरीतिके अनुसार मरनेवालोंका जैसा क्रिया-कर्म होता है, वह सब कराया॥ ४९॥✎ 1673

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1673 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लोक-रीतिके → लोकरीतिके

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