श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

मातरं पितरं चैव मोचयित्वाथ बन्धनात्।

कृष्णरामौ ववन्दाते शिरसाऽऽस्पृश्य पादयोः॥ ५०

mātaraṃ pitaraṃ caiva mocayitvātha bandhanāt|

kṛṣṇarāmau vavandāte śirasā''spṛśya pādayoḥ|| 50

अर्थ

तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने जेलमें जाकर अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाया और सिरसे स्पर्श करके उनके चरणोंकी वन्दना की॥ ५०॥✎ 1919

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1919 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): बल-रामजीने → बलरामजीने

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