श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

आह चास्मान् महाराज प्रजाश्‍चाज्ञप्तुमर्हसि।

ययातिशापाद् यदुभिर्नासितव्यं नृपासने॥ १३

āha cāsmān mahārāja prajāścājñaptumarhasi|

yayātiśāpād yadubhirnāsitavyaṃ nṛpāsane|| 13

अर्थ

देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार अपने माता-पिताको सान्त्वना देकर अपने नाना उग्रसेनको यदुवंशियोंका राजा बना दिया॥ १२॥ और उनसे कहा—‘महाराज! हम आपकी प्रजा हैं। आप हमलोगोंपर शासन कीजिये। राजा ययातिका शाप होनेके कारण यदुवंशी राजसिंहासनपर नहीं बैठ सकते; (परंतु मेरी ऐसी ही इच्छा है, इसलिये आपको कोई दोष न होगा)॥ १३॥ जब मैं सेवक बनकर आपकी सेवा करता रहूँगा, तब बड़े-बड़े देवता भी सिर झुकाकर आपको भेंट देंगे।’ दूसरे नरपतियोंके बारेमें तो कहना ही क्या है॥ १४॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे विश्‍वके विधाता हैं। उन्होंने, जो कंसके भयसे व्याकुल होकर इधर-उधर भाग गये थे, उन यदु, वृष्णि, अन्धक, मधु, दाशार्ह और कुकुर आदि वंशोंमें उत्पन्‍न समस्त सजातीय सम्बन्धियोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर बुलवाया। उन्हें घरसे बाहर रहनेमें बड़ा क्लेश उठाना पड़ा था। भगवान्‌ने उनका सत्कार किया, सान्त्वना दी और उन्हें खूब धन-सम्पत्ति देकर तृप्त किया तथा अपने-अपने घरोंमें बसा दिया॥ १५-१६॥

यह व्याख्या श्लोक 10.45.12 से 10.45.16 तककी एक साथ है।

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