श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः।

बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः॥ १४

mayi bhṛtya upāsīne bhavato vibudhādayaḥ|

baliṃ harantyavanatāḥ kimutānye narādhipāḥ|| 14

अर्थ

जब मैं सेवक बनकर आपकी सेवा करता रहूँगा, तब बड़े-बड़े देवता भी सिर झुकाकर आपको भेंट देंगे।’ दूसरे नरपतियोंके बारेमें तो कहना ही क्या है॥ १४॥

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