गुरुजीने कहा—‘बेटा! तुम दोनोंने भलीभाँति गुरुदक्षिणा दी। अब और क्या चाहिये? जो तुम्हारे जैसे पुरुषोत्तमोंका गुरु है, उसका कौन-सा मनोरथ अपूर्ण रह सकता है?॥ ४७॥
सम्यक् संपादितो वत्स भवद्भ्यां गुरुनिष्क्रयः।
को नु युष्मद्विधगुरोः कामानामवशिष्यते॥ ४७
गुरुजीने कहा—‘बेटा! तुम दोनोंने भलीभाँति गुरुदक्षिणा दी। अब और क्या चाहिये? जो तुम्हारे जैसे पुरुषोत्तमोंका गुरु है, उसका कौन-सा मनोरथ अपूर्ण रह सकता है?॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 414) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/45/47/