श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

गुरुरुवाच

सम्यक् संपादितो वत्स भवद‍्भ्यां गुरुनिष्क्रयः।

को नु युष्मद्विधगुरोः कामानामवशिष्यते॥ ४७

samyak saṃpādito vatsa bhavadbhyāṃ guruniṣkrayaḥ|

ko nu yuṣmadvidhaguroḥ kāmānāmavaśiṣyate|| 47

अर्थ

गुरुजीने कहा—‘बेटा! तुम दोनोंने भलीभाँति गुरुदक्षिणा दी। अब और क्या चाहिये? जो तुम्हारे जैसे पुरुषोत्तमोंका गुरु है, उसका कौन-सा मनोरथ अपूर्ण रह सकता है?॥ ४७॥

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