॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.47.3
तं प्रश्रयेणावनताः सुसत्कृतं
सव्रीडहासेक्षणसूनृतादिभिः ।
रहस्यपृच्छन्नुपविष्टमासने
विज्ञाय सन्देशहरं रमापतेः॥ ३
taṃ praśrayeṇāvanatāḥ susatkṛtaṃ
savrīḍahāsekṣaṇasūnṛtādibhiḥ |
rahasyapṛcchannupaviṣṭamāsane
vijñāya sandeśaharaṃ ramāpateḥ|| 3
अर्थ
जब उन्हें मालूम हुआ कि ये तो रमारमण भगवान् श्रीकृष्णका सन्देश लेकर आये हैं, तब उन्होंने विनयसे झुककर सलज्ज हास्य, चितवन और मधुर वाणी आदिसे उद्धवजीका अत्यन्त सत्कार किया तथा एकान्तमें आसनपर बैठाकर वे उनसे इस प्रकार कहने लगीं—॥ ३॥