श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

जानीमस्त्वां यदुपतेः पार्षदं समुपागतम्।

भर्त्रेह प्रेषितः पित्रोर्भवान् प्रियचिकीर्षया॥ ४

jānīmastvāṃ yadupateḥ pārṣadaṃ samupāgatam|

bhartreha preṣitaḥ pitrorbhavān priyacikīrṣayā|| 4

अर्थ

‘उद्धवजी! हम जानती हैं कि आप यदुनाथके पार्षद हैं। उन्हींका संदेश लेकर यहाँ पधारे हैं। आपके स्वामीने अपने माता-पिताको सुख देनेके लिये आपको यहाँ भेजा है॥ ४॥

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