श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

यत्त्वहं भवतीनां वै दूरे वर्ते प्रियो दृशाम्।

मनसः सन्‍निकर्षार्थं मदनुध्यानकाम्यया॥ ३४

yattvahaṃ bhavatīnāṃ vai dūre varte priyo dṛśām|

manasaḥ sannikarṣārthaṃ madanudhyānakāmyayā|| 34

अर्थ

गोपियो! इसमें सन्देह नहीं कि मैं तुम्हारे नयनोंका ध्रुवतारा हूँ। तुम्हारा जीवन-सर्वस्व हूँ। किन्तु मैं जो तुमसे इतना दूर रहता हूँ, उसका कारण है। वह यही कि तुम निरन्तर मेरा ध्यान कर सको, शरीरसे दूर रहनेपर भी मनसे तुम मेरी सन्‍निधिका अनुभव करो, अपना मन मेरे पास रखो॥ ३४॥✎ 1677

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1677 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रास-क्रीडा → रासक्रीडा

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