श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

यथा दूरचरे प्रेष्ठे मन आविश्य वर्तते।

स्त्रीणां च न तथा चेतः सन्‍निकृष्टेऽक्षिगोचरे॥ ३५

yathā dūracare preṣṭhe mana āviśya vartate|

strīṇāṃ ca na tathā cetaḥ sannikṛṣṭe'kṣigocare|| 35

अर्थ

क्योंकि स्त्रियों और अन्यान्य प्रेमियोंका चित्त अपने परदेशी प्रियतममें जितना निश्‍चल भावसे लगा रहता है, उतना आँखोंके सामने, पास रहनेवाले प्रियतममें नहीं लगता॥ ३५॥✎ 1677

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1677 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रास-क्रीडा → रासक्रीडा

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