श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

दुराराध्यं समाराध्य विष्णुं सर्वेश्‍वरेश्‍वरम्।

यो वृणीते मनोग्राह्यमसत्त्वात् कुमनीष्यसौ॥ ११

durārādhyaṃ samārādhya viṣṇuṃ sarveśvareśvaram|

yo vṛṇīte manogrāhyamasattvāt kumanīṣyasau|| 11

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् ब्रह्मा आदि समस्त ईश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं। उनको प्रसन्‍न कर लेना भी जीवके लिये बहुत ही कठिन है। जो कोई उन्हें प्रसन्‍न करके उनसे विषय-सुख माँगता है, वह निश्‍चय ही दुर्बुद्धि है; क्योंकि वास्तवमें विषय-सुख अत्यन्त तुच्छ—नहींके बराबर है॥ ११॥

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