॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.48.21
सृजस्यथो लुम्पसि पासि विश्वं
रजस्तमःसत्त्वगुणैः स्वशक्तिभिः।
न बध्यसे तद्गुणकर्मभिर्वा
ज्ञानात्मनस्ते क्व च बन्धहेतुः॥ २१
sṛjasyatho lumpasi pāsi viśvaṃ
rajastamaḥsattvaguṇaiḥ svaśaktibhiḥ|
na badhyase tadguṇakarmabhirvā
jñānātmanaste kva ca bandhahetuḥ|| 21
अर्थ
प्रभो! आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणरूप अपनी शक्तियोंसे क्रमशः जगत्की रचना, पालन और संहार करते हैं; किन्तु आप उन गुणोंसे अथवा उनके द्वारा होनेवाले कर्मोंसे बन्धनमें नहीं पड़ते, क्योंकि आप शुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं। ऐसी स्थितिमें आपके लिये बन्धनका कारण ही क्या हो सकता है?॥ २१॥✎ 1680