श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

देहाद्युपाधेरनिरूपितत्वाद्

भवो न साक्षान्‍न भिदाऽऽत्मनः स्यात्।

अतो न बन्धस्तव नैव मोक्षः

स्यातां निकामस्त्वयि नोऽविवेकः॥ २२

dehādyupādheranirūpitatvād

bhavo na sākṣānna bhidā''tmanaḥ syāt|

ato na bandhastava naiva mokṣaḥ

syātāṃ nikāmastvayi no'vivekaḥ|| 22

अर्थ

प्रभो! स्वयं आत्मवस्तुमें स्थूलदेह, सूक्ष्मदेह आदि उपाधियाँ न होनेके कारण न तो उसमें जन्म-मृत्यु है और न किसी प्रकारका भेदभाव। यही कारण है कि न आपमें बन्धन है और न मोक्ष! आपमें अपने-अपने अभिप्रायके अनुसार बन्धन या मोक्षकी जो कुछ कल्पना होती है, उसका कारण केवल हमारा अविवेक ही है॥ २२॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें