आपने जगत्के कल्याणके लिये यह सनातन वेदमार्ग प्रकट किया है। जब-जब इसे पाखण्ड-पथसे चलनेवाले दुष्टोंके द्वारा क्षति पहुँचती है, तब-तब आप शुद्ध सत्त्वमय शरीर ग्रहण करते हैं॥ २३॥
त्वयोदितोऽयं जगतो हिताय
यदा यदा वेदपथः पुराणः।
बाध्येत पाखण्डपथैरसद्भि-
स्तदा भवान् सत्त्वगुणं बिभर्ति॥ २३
आपने जगत्के कल्याणके लिये यह सनातन वेदमार्ग प्रकट किया है। जब-जब इसे पाखण्ड-पथसे चलनेवाले दुष्टोंके द्वारा क्षति पहुँचती है, तब-तब आप शुद्ध सत्त्वमय शरीर ग्रहण करते हैं॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 438) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/23/