श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

स त्वं प्रभोऽद्य वसुदेवगृहेऽवतीर्णः

स्वांशेन भारमपनेतुमिहासि भूमेः।

अक्षौहिणीशतवधेन सुरेतरांश-

राज्ञाममुष्य च कुलस्य यशो वितन्वन्॥ २४

sa tvaṃ prabho'dya vasudevagṛhe'vatīrṇaḥ

svāṃśena bhāramapanetumihāsi bhūmeḥ|

akṣauhiṇīśatavadhena suretarāṃśa-

rājñāmamuṣya ca kulasya yaśo vitanvan|| 24

अर्थ

प्रभो! वही आप इस समय अपने अंश श्रीबलरामजीके साथ पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये यहाँ वसुदेवजीके घर अवतीर्ण हुए हैं। आप असुरोंके अंशसे उत्पन्‍न नाममात्रके शासकोंकी सौ-सौ अक्षौहिणी सेनाका संहार करेंगे और यदुवंशके यशका विस्तार करेंगे॥ २४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें