परीक्षित्! कुब्जाने केवल अंगराग समर्पित किया था। उतनेसे ही उसे उन सर्वशक्तिमान् भगवान्की प्राप्ति हुई, जो कैवल्यमोक्षके अधीश्वर हैं और जिनकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। परन्तु उस दुर्भगाने उन्हें प्राप्त करके भी व्रजगोपियोंकी भाँति सेवा न माँगकर यही माँगा—॥ ८॥✎ 1679
सैवं कैवल्यनाथं तं प्राप्य दुष्प्रापमीश्वरम्।
अंगरागार्पणेनाहो दुर्भगेदमयाचत॥ ८
परीक्षित्! कुब्जाने केवल अंगराग समर्पित किया था। उतनेसे ही उसे उन सर्वशक्तिमान् भगवान्की प्राप्ति हुई, जो कैवल्यमोक्षके अधीश्वर हैं और जिनकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। परन्तु उस दुर्भगाने उन्हें प्राप्त करके भी व्रजगोपियोंकी भाँति सेवा न माँगकर यही माँगा—॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 436) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)