श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

सैवं कैवल्यनाथं तं प्राप्य दुष्प्रापमीश्‍वरम्।

अंगरागार्पणेनाहो दुर्भगेदमयाचत॥ ८

saivaṃ kaivalyanāthaṃ taṃ prāpya duṣprāpamīśvaram|

aṃgarāgārpaṇenāho durbhagedamayācata|| 8

अर्थ

परीक्षित्! कुब्जाने केवल अंगराग समर्पित किया था। उतनेसे ही उसे उन सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की प्राप्ति हुई, जो कैवल्यमोक्षके अधीश्‍वर हैं और जिनकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। परन्तु उस दुर्भगाने उन्हें प्राप्त करके भी व्रजगोपियोंकी भाँति सेवा न माँगकर यही माँगा—॥ ८॥✎ 1679

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1679 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: श्याम-सुन्दर → श्यामसुन्दर

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