मैं शत्रुओंके बीच घिरकर शोकाकुल हो रही हूँ। मेरी वही दशा है, जैसे कोई हरिनी भेड़ियोंके बीचमें पड़ गयी हो। मेरे बच्चे बिना बापके हो गये हैं। क्या हमारे श्रीकृष्ण कभी यहाँ आकर मुझको और इन अनाथ बालकोंको सान्त्वना देंगे?॥ १०॥✎ 2106
सापत्नमध्ये शोचन्तीं वृकाणां हरिणीमिव।
सान्त्वयिष्यति मां वाक्यैः पितृहीनांश्च बालकान्॥ १०
मैं शत्रुओंके बीच घिरकर शोकाकुल हो रही हूँ। मेरी वही दशा है, जैसे कोई हरिनी भेड़ियोंके बीचमें पड़ गयी हो। मेरे बच्चे बिना बापके हो गये हैं। क्या हमारे श्रीकृष्ण कभी यहाँ आकर मुझको और इन अनाथ बालकोंको सान्त्वना देंगे?॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.49.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 441) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/49/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)