श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.49.10

दशम स्कन्ध · अध्याय 49 · अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सापत्‍नमध्ये शोचन्तीं वृकाणां हरिणीमिव।

सान्त्वयिष्यति मां वाक्यैः पितृहीनांश्‍च बालकान्॥ १०

sāpatnamadhye śocantīṃ vṛkāṇāṃ hariṇīmiva|

sāntvayiṣyati māṃ vākyaiḥ pitṛhīnāṃśca bālakān|| 10

अर्थ

मैं शत्रुओंके बीच घिरकर शोकाकुल हो रही हूँ। मेरी वही दशा है, जैसे कोई हरिनी भेड़ियोंके बीचमें पड़ गयी हो। मेरे बच्चे बिना बापके हो गये हैं। क्या हमारे श्रीकृष्ण कभी यहाँ आकर मुझको और इन अनाथ बालकोंको सान्त्वना देंगे?॥ १०॥✎ 2106

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2106 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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