श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.49.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 49 · अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यथावदुपसंगम्य बन्धुभिर्गान्दिनीसुतः।

सम्पृष्टस्तैः सुहृद्वार्तां स्वयं चापृच्छदव्ययम्॥ ३

yathāvadupasaṃgamya bandhubhirgāndinīsutaḥ|

sampṛṣṭastaiḥ suhṛdvārtāṃ svayaṃ cāpṛcchadavyayam|| 3

अर्थ

जब गान्दिनीनन्दन अक्रूरजी सब इष्ट-मित्रों और सम्बन्धियोंसे भलीभाँति मिल चुके, तब उनसे उन लोगोंने अपने मथुरावासी स्वजन-सम्बन्धियोंकी कुशल-क्षेम पूछी। उनका उत्तर देकर अक्रूरजीने भी हस्तिनापुरवासियोंके कुशलमंगलके सम्बन्धमें पूछताछ की॥ ३॥✎ 1435 1436

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1435 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हस्तिनापुर-वासियोंके → हस्तिनापुरवासियोंके
  • #1436 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अश्‍व-त्थामा, → अश्‍वत्थामा,

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