श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.49.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 49 · अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

उवास कतिचिन्मासान् राज्ञो वृत्तविवित्सया।

दुष्प्रजस्याल्पसारस्य खलच्छन्दानुवर्तिनः॥ ४

uvāsa katicinmāsān rājño vṛttavivitsayā|

duṣprajasyālpasārasya khalacchandānuvartinaḥ|| 4

अर्थ

परीक्षित्! अक्रूरजी यह जाननेके लिये कि धृतराष्ट्र पाण्डवोंके साथ कैसा व्यवहार करते हैं, कुछ महीनोंतक वहीं रहे। सच पूछो तो, धृतराष्ट्रमें अपने दुष्ट पुत्रोंकी इच्छाके विपरीत कुछ भी करनेका साहस न था। वे शकुनि आदि दुष्टोंकी सलाहके अनुसार ही काम करते थे॥ ४॥✎ 1435 1436

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1435 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हस्तिनापुर-वासियोंके → हस्तिनापुरवासियोंके
  • #1436 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अश्‍व-त्थामा, → अश्‍वत्थामा,

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