श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.49.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 49 · अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

पृथा तु भ्रातरं प्राप्तमक्रूरमुपसृत्य तम्।

उवाच जन्मनिलयं स्मरन्त्यश्रुकलेक्षणा॥ ७

pṛthā tu bhrātaraṃ prāptamakrūramupasṛtya tam|

uvāca janmanilayaṃ smarantyaśrukalekṣaṇā|| 7

अर्थ

जब अक्रूरजी कुन्तीके घर आये, तब वह अपने भाईके पास जा बैठीं। अक्रूरजीको देखकर कुन्तीके मनमें अपने मायकेकी स्मृति जग गयी और नेत्रोंमें आँसू भर आये। उन्होंने कहा—॥ ७॥✎ 2106

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2106 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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