॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.5.26
कच्चित् पशव्यं निरुजं भूर्यम्बुतृणवीरुधम्।
बृहद्वनं तदधुना यत्रास्से त्वं सुहृद्वृतः॥ २६
kaccit paśavyaṃ nirujaṃ bhūryambutṛṇavīrudham|
bṛhadvanaṃ tadadhunā yatrāsse tvaṃ suhṛdvṛtaḥ|| 26
अर्थ
आजकल तुम जिस महावनमें अपने भाई-बन्धु और स्वजनोंके साथ रहते हो, उसमें जल, घास और लता-पत्रादि तो भरे-पूरे हैं न? वह वन पशुओंके लिये अनुकूल और सब प्रकारके रोगोंसे तो बचा है?॥ २६॥