श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.60

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

द्वारकायामभूद् राजन् महामोदः पुरौकसाम्।

रुक्मिण्या रमयोपेतं दृष्ट्वा कृष्णं श्रियः पतिम्॥ ६०

dvārakāyāmabhūd rājan mahāmodaḥ puraukasām|

rukmiṇyā ramayopetaṃ dṛṣṭvā kṛṣṇaṃ śriyaḥ patim|| 60

अर्थ

महाराज! भगवती लक्ष्मीजीको रुक्मिणीके रूपमें साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्णके साथ देखकर द्वारकावासी नर-नारियोंको परम आनन्द हुआ॥ ६०॥✎ 892 1689

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे
उत्तरार्धे रुक्मिण्युद्वाहे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #892 शब्दोंके बीचका स्थान: लगा।क्यों → लगा। क्यों
  • #1689 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: द्वारका-पुरीमें → द्वारकापुरीमें

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