॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.6.22
अव्यादजोऽङ्घ्रि मणिमांस्तव जान्वथोरू
यज्ञोऽच्युतः कटितटं जठरं हयास्यः।
हृत् केशवस्त्वदुर ईश इनस्तु कण्ठं
विष्णुर्भुजं मुखमुरुक्रम ईश्वरः कम्॥ २२
avyādajo'ṅghri maṇimāṃstava jānvathorū
yajño'cyutaḥ kaṭitaṭaṃ jaṭharaṃ hayāsyaḥ|
hṛt keśavastvadura īśa inastu kaṇṭhaṃ
viṣṇurbhujaṃ mukhamurukrama īśvaraḥ kam|| 22
अर्थ
वे कहने लगीं—‘अजन्मा भगवान् तेरे पैरोंकी रक्षा करें, मणिमान् घुटनोंकी, यज्ञपुरुष जाँघोंकी, अच्युत कमरकी, हयग्रीव पेटकी, केशव हृदयकी, ईश वक्षःस्थलकी, सूर्य कण्ठकी, विष्णु बाँहोंकी, उरुक्रम मुखकी और ईश्वर सिरकी रक्षा करें॥ २२॥