॥ श्रीहरिः ॥
कलेवरं परशुभिश्छित्त्वा तत्ते व्रजौकसः।
दूरे क्षिप्त्वावयवशो न्यदहन् काष्ठधिष्ठितम्॥ ३३
kalevaraṃ paraśubhiśchittvā tatte vrajaukasaḥ|
dūre kṣiptvāvayavaśo nyadahan kāṣṭhadhiṣṭhitam|| 33
अर्थ
तबतक व्रजवासियोंने कुल्हाड़ीसे पूतनाके शरीरको टुकड़े-टुकड़े कर डाला और गोकुलसे दूर ले जाकर लकड़ियोंपर रखकर जला दिया॥ ३३॥✎ 2060
कलेवरं परशुभिश्छित्त्वा तत्ते व्रजौकसः।
दूरे क्षिप्त्वावयवशो न्यदहन् काष्ठधिष्ठितम्॥ ३३
तबतक व्रजवासियोंने कुल्हाड़ीसे पूतनाके शरीरको टुकड़े-टुकड़े कर डाला और गोकुलसे दूर ले जाकर लकड़ियोंपर रखकर जला दिया॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.6.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 160) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/6/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #2060 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि