श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

दह्यमानस्य देहस्य धूमश्‍चागुरुसौरभः।

उत्थितः कृष्णनिर्भुक्तसपद्याहतपाप्मनः॥ ३४

dahyamānasya dehasya dhūmaścāgurusaurabhaḥ|

utthitaḥ kṛṣṇanirbhuktasapadyāhatapāpmanaḥ|| 34

अर्थ

जब उसका शरीर जलने लगा, तब उसमेंसे ऐसा धूँआ निकला, जिसमेंसे अगरकी-सी सुगन्ध आ रही थी। क्यों न हो, भगवान्‌ने जो उसका दूध पी लिया था—जिससे उसके सारे पाप तत्काल ही नष्ट हो गये थे॥ ३४॥✎ 2060

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2060 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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