श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यातुधान्यपि सा स्वर्गमवाप जननीगतिम्।

कृष्णभुक्तस्तनक्षीराः किमु गावो नु मातरः॥ ३८

yātudhānyapi sā svargamavāpa jananīgatim|

kṛṣṇabhuktastanakṣīrāḥ kimu gāvo nu mātaraḥ|| 38

अर्थ

माना कि वह राक्षसी थी, परन्तु उसे उत्तम-से-उत्तम गति—जो माताको मिलनी चाहिये—प्राप्त हुई। फिर जिनके स्तनका दूध भगवान्‌ने बड़े प्रेमसे पिया, उन गौओं और माताओंकी* तो बात ही क्या है॥ ३८॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    जब ब्रह्माजी ग्वालबाल और बछड़ोंको हर ले गये, तब भगवान् स्वयं ही बछड़े और ग्वालबाल बन गये, उस समय अपने विभिन्‍न रूपोंसे उन्होंने अपने साथी अनेकों गोप और वत्सोंकी माताओंका स्तनपान किया। इसीलिये यहाँ बहुवचनका प्रयोग किया गया है।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 161)

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