वह पूतना आकाशमार्गसे चल सकती थी और अपनी इच्छाके अनुसार रूप भी बना लेती थी। एक दिन नन्दबाबाके गोकुलके पास आकर उसने मायासे अपनेको एक सुन्दरी युवती बना लिया और गोकुलके भीतर घुस गयी॥ ४॥✎ 1654
सा खेचर्येकदोपेत्य पूतना नन्दगोकुलम्।
योषित्वा माययाऽऽत्मानं प्राविशत् कामचारिणी॥ ४
वह पूतना आकाशमार्गसे चल सकती थी और अपनी इच्छाके अनुसार रूप भी बना लेती थी। एक दिन नन्दबाबाके गोकुलके पास आकर उसने मायासे अपनेको एक सुन्दरी युवती बना लिया और गोकुलके भीतर घुस गयी॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.6.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 155) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/6/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)