उसने बड़ा सुन्दर रूप बनाया था। उसकी चोटियोंमें बेलेके फूल गुँथे हुए थे। सुन्दर वस्त्र पहने हुए थी। जब उसके कर्णफूल हिलते थे, तब उनकी चमकसे मुखकी ओर लटकी हुई अलकें और भी शोभायमान हो जाती थीं। उसके नितम्ब और कुचकलश ऊँचे-ऊँचे थे और कमर पतली थी॥ ५॥✎ 1654
तां केशबन्धव्यतिषक्तमल्लिकां
बृहन्नितम्बस्तनकृच्छ्रमध्यमाम् ।
सुवाससं कम्पितकर्णभूषण-
त्विषोल्लसत्कुन्तलमण्डिताननाम्॥ ५
उसने बड़ा सुन्दर रूप बनाया था। उसकी चोटियोंमें बेलेके फूल गुँथे हुए थे। सुन्दर वस्त्र पहने हुए थी। जब उसके कर्णफूल हिलते थे, तब उनकी चमकसे मुखकी ओर लटकी हुई अलकें और भी शोभायमान हो जाती थीं। उसके नितम्ब और कुचकलश ऊँचे-ऊँचे थे और कमर पतली थी॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.6.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 155) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/6/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)