॥ श्रीहरिः ॥
नन्दः स्वपुत्रमादाय प्रेत्यागतमुदारधीः।
मूर्ध्न्युपाघ्राय परमां मुदं लेभे कुरूद्वह॥ ४३
nandaḥ svaputramādāya pretyāgatamudāradhīḥ|
mūrdhnyupāghrāya paramāṃ mudaṃ lebhe kurūdvaha|| 43
अर्थ
परीक्षित्! उदारशिरोमणि नन्दबाबाने मृत्युके मुखसे बचे हुए अपने लालाको गोदमें उठा लिया और बार-बार उसका सिर सूँघकर मन-ही-मन बहुत आनन्दित हुए॥ ४३॥
नन्दः स्वपुत्रमादाय प्रेत्यागतमुदारधीः।
मूर्ध्न्युपाघ्राय परमां मुदं लेभे कुरूद्वह॥ ४३
परीक्षित्! उदारशिरोमणि नन्दबाबाने मृत्युके मुखसे बचे हुए अपने लालाको गोदमें उठा लिया और बार-बार उसका सिर सूँघकर मन-ही-मन बहुत आनन्दित हुए॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.6.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 161) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/6/43/