सुन्दरी! देखो, हम जरासन्ध आदि राजाओंसे डरकर समुद्रकी शरणमें आ बसे हैं। बड़े-बड़े बलवानोंसे हमने वैर बाँध रखा है और प्रायः राजसिंहासनके अधिकारसे भी हम वंचित ही हैं॥ १२॥✎ 1438
राजभ्यो बिभ्यतः सुभ्रूः समुद्रं शरणं गतान्।
बलवद्भिः कृतद्वेषान् प्रायस्त्यक्तनृपासनान्॥ १२
सुन्दरी! देखो, हम जरासन्ध आदि राजाओंसे डरकर समुद्रकी शरणमें आ बसे हैं। बड़े-बड़े बलवानोंसे हमने वैर बाँध रखा है और प्रायः राजसिंहासनके अधिकारसे भी हम वंचित ही हैं॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 512) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1438 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदर्भ-राजकुमारी! → विदर्भराजकुमारी!