वे लोग भयभीत होकर भगवान्के पास दौड़े हुए आये; भगवान् उस समय सभामें चौसर खेल रहे थे, उन लोगोंने भगवान्से प्रार्थना की—‘तीनों लोकोंके एकमात्र स्वामी! द्वारका नगरी इस आगसे भस्म होना चाहती है। आप हमारी रक्षा कीजिये। आपके सिवा इसकी रक्षा और कोई नहीं कर सकता’॥ ३६॥✎ 8931953
अक्षैः सभायां क्रीडन्तं भगवन्तं भयातुराः।
त्राहि त्राहि त्रिलोकेश वह्नेः प्रदहतः पुरम्॥ ३६
वे लोग भयभीत होकर भगवान्के पास दौड़े हुए आये; भगवान् उस समय सभामें चौसर खेल रहे थे, उन लोगोंने भगवान्से प्रार्थना की—‘तीनों लोकोंके एकमात्र स्वामी! द्वारका नगरी इस आगसे भस्म होना चाहती है। आप हमारी रक्षा कीजिये। आपके सिवा इसकी रक्षा और कोई नहीं कर सकता’॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 549) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/66/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)