श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.7.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

दैत्यो नाम्‍ना तृणावर्तः कंसभृत्यः प्रणोदितः।✎ 1879

चक्रवातस्वरूपेण जहारासीनमर्भकम्॥ २०

daityo nāmnā tṛṇāvartaḥ kaṃsabhṛtyaḥ praṇoditaḥ|

cakravātasvarūpeṇa jahārāsīnamarbhakam|| 20

अर्थ

तृणावर्त नामका एक दैत्य था। वह कंसका निजी सेवक था। कंसकी प्रेरणासे ही बवंडरके रूपमें वह गोकुलमें आया और बैठे हुए बालक श्रीकृष्णको उड़ाकर आकाशमें ले गया॥ २०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1879 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): प्रणोदित्रः → प्रणोदितः

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